Class 12 राजनीति विज्ञान Chapter 3 : समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व | American Hegemony in the Contemporary World
1. एकध्रुवीय विश्व का उदय
शीतयुद्ध के दौरान दुनिया दो गुटों में बँटी थी, लेकिन 1991 में सोवियत संघ के अचानक विघटन ने अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया। दुनिया की दो महाशक्तियों में से एक का वजूद मिट गया और संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। इस नई व्यवस्था को ‘एकध्रुवीय विश्व’ कहा गया, जहाँ अमेरिका का वर्चस्व स्थापित हुआ।
वर्चस्व के तीन प्रमुख आयाम
स्रोतों के अनुसार, अमेरिकी वर्चस्व को केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रखा जा सकता; यह तीन स्तरों पर काम करता है—
1. सैन्य शक्ति के रूप में (Hard Power) – अमेरिका की सैन्य क्षमता आज अद्वितीय है। वह दुनिया में कहीं भी, कभी भी अचूक वार कर सकता है। अमेरिका अपनी सैन्य तकनीक और अनुसंधान पर जितना खर्च करता है, उतना दुनिया के अगले 12 ताकतवर देश मिलकर भी नहीं करते। उसकी सेना का विस्तार पूरे विश्व में छह अलग-अलग कमांडों में फैला हुआ है।
2. ढाँचागत ताकत के रूप में (Structural Power) – इसका अर्थ है वैश्विक अर्थव्यवस्था के नियमों को अपने अनुकूल बनाना। अमेरिका समुद्री व्यापार-मार्ग (SLOCs) की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और इंटरनेट जैसी वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं पर नियंत्रण रखता है, जो मूल रूप से एक अमेरिकी सैन्य परियोजना थी। विश्व बैंक, IMF और WTO जैसी संस्थाएँ भी अमेरिकी वर्चस्व का ही परिणाम हैं। यहाँ तक कि MBA की डिग्री भी अमेरिकी ढाँचागत शक्ति का उदाहरण है।
3. सांस्कृतिक वर्चस्व (Soft Power) – यह ‘सहमति गढ़ने’ की शक्ति है। अमेरिकी जीवनशैली, खान-पान और पहनावा पूरी दुनिया को आकर्षित करता है। शीतयुद्ध के दौरान ‘नीली जींस’ सोवियत संघ के युवाओं के लिए आजादी का प्रतीक बन गई थी, जिसने बिना किसी युद्ध के सोवियत व्यवस्था को अंदर से कमजोर किया।
महत्वपूर्ण सैन्य अभियान (Military Operations)
• ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म (1991) – कुवैत को इराक के कब्जे से मुक्त कराने के लिए चलाया गया प्रथम खाड़ी युद्ध। इसे ‘कंप्यूटर युद्ध’ और ‘वीडियो गेम वार’ भी कहा गया।
• ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच (1998) – सूडान और अफगानिस्तान में अल-कायदा के ठिकानों पर क्रूज मिसाइलों से हमला।
• ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम (2001) – 9/11 के हमलों के जवाब में अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ वैश्विक युद्ध।
• ऑपरेशन इराकी फ्रीडम (2003) – इराक के पास सामूहिक संहार के हथियार होने के संदेह में हमला, जिसका मुख्य उद्देश्य इराक के तेल भंडार पर नियंत्रण था।
अमेरिकी शक्ति पर अंकुश (Constraints)
इतिहास गवाह है कि साम्राज्यों का पतन उनकी आंतरिक कमज़ोरियों से होता है। अमेरिका के सामने तीन बड़ी बाधाएँ हैं—
1. संस्थागत बनावट – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का बँवारा सैन्य शक्ति के बेलगाम इस्तेमाल को रोकता है।
2. अमेरिकी समाज – वहाँ की जनता और मीडिया शासन के उद्देश्यों पर संदेह करते हैं, जो विदेशी युद्धों पर अंकुश लगाता है।
3. नाटो (NATO) – अमेरिका के लोकतांत्रिक सहयोगी देश उसके वर्चस्व पर लगाम लगा सकते हैं।
भारत और अमेरिका के संबंध
वर्तमान में भारत और अमेरिका के संबंध तकनीक और आर्थिक हितों पर टिके हैं—
• भारत के सॉफ्टवेयर निर्यात का 65% हिस्सा अमेरिका को जाता है।
• 3 लाख भारतीय सिलिकॉन वैली में काम करते हैं।
• बोइंग कंपनी के 35% तकनीकी कर्मचारी भारतीय मूल के हैं।
भारत के लिए रणनीतिक विकल्प
• दूरी बनाए रखना – अपनी राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाने पर ध्यान देना।
• बैंडवैगन (Bandwagon) रणनीति – वर्चस्व के तंत्र में रहकर अवसरों का लाभ उठाना।
• गठबंधन बनाना – विकासशील देशों के साथ मिलकर प्रतिकार करना।
वर्चस्व से निपटने के अन्य तरीके
• छिपने की नीति (Hide Strategy) – ताकतवर देश की नजरों से दूर रहना। जैसे चीन और रूस ने कुछ समय तक किया)।
• राज्येतर संस्थाओं का विरोध – लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी और सामाजिक आंदोलन मिलकर वैश्विक स्तर पर अमेरिकी नीतियों का विरोध कर सकते हैं।
निष्कर्ष – वर्चस्व हमेशा के लिए नहीं रहता। इतिहास बताता है कि शक्ति का संतुलन समय के साथ बदलता है (जैसे फ्रांस और ब्रिटेन का वर्चस्व समाप्त हुआ)। भविष्य में अन्य शक्तियों का उभार अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे सकता है।
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