Daily Current Affairs : क्या अमेरिका भारत को ‘दूसरा चीन’ बनने से रोकना चाहता है? रायसीना डायलॉग और अमेरिका के बदलते तेवर
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर हेनरी किसिंजर का एक पुराना कथन तेजी से वायरल हो रहा है: “अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना घातक (Fatal) है”। यह चर्चा तब शुरू हुई जब नई दिल्ली में आयोजित 11वें रायसीना डायलॉग के दौरान एक अमेरिकी अधिकारी के बयान ने भारतीय राजनीति और कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी।
रायसीना डायलॉग और ‘चीन वाली गलती’ का जिक्र
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) द्वारा आयोजित रायसीना डायलॉग के 11वें संस्करण में दुनिया भर के नेता और थिंक-टैंक हिस्सा ले रहे हैं। इसी मंच पर अमेरिकी उप-सचिव (Deputy Secretary) क्रिस्टोफर लांडू ने एक विवादास्पद बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत के साथ वह गलती नहीं दोहराएगा जो उसने 20 साल पहले चीन के साथ की थी।
लांडू का सीधा संकेत इस ओर था कि अमेरिका ने चीन को आर्थिक महाशक्ति बनने में जो मदद दी, अब वह भारत के मामले में उतनी उदारता नहीं दिखाएगा।
आखिर क्या थी अमेरिका की ‘चीन वाली गलती’?
अमेरिका का मानना है कि साल 2000 में चीन को विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल करवाना और उसे ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देना उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी। इसके परिणाम स्वरूप:
- निर्यात में उछाल: 1990 में चीन केवल 8 देशों का टॉप एक्सपोर्टर था, जो आज 125 देशों तक पहुँच गया है।
- संपत्ति की बढ़त: साल 2000 से 2020 के बीच चीन की संपत्ति 7 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 120 ट्रिलियन डॉलर हो गई, जबकि अमेरिका 90 ट्रिलियन डॉलर पर ही रह गया है।
- व्यापार युद्ध: आज चीन का कुल व्यापार 6.3 ट्रिलियन डॉलर है, जो अमेरिका के 5.3 ट्रिलियन डॉलर से कहीं अधिक है।
अमेरिका को डर है कि यदि भारत भी इसी रफ्तार से बढ़ा, तो भविष्य में वह अमेरिकी हितों के लिए चीन जैसी ही चुनौती पेश कर सकता है।
तेल और टैरिफ: डिक्टेशन या डिप्लोमेसी?
भारत में इस समय एक और मुद्दा गर्म है—रूसी तेल पर अमेरिकी रुख। पिछले दिनों अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर भारत पर 25% टैरिफ लगाने की बात की थी। लेकिन जब ईरान-इजरायल तनाव के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ में तेल की सप्लाई बाधित हुई, तो अमेरिकी वाणिज्य मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिन की छूट (Waiver) देने का ऐलान कर दिया।
इस पर विवाद तब और बढ़ गया जब स्कॉट बेसेंट ने कथित तौर पर कहा कि “भारतीय अच्छे एक्टर हैं, जैसा हम कहते हैं वैसा ही वे करते हैं”। इस बयान को भारतीय विपक्ष ने देश के अपमान और संप्रभुता पर चोट के रूप में देखा है।
भारत को रोकने की अमेरिकी रणनीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की उभरती अर्थव्यवस्था (जो 2047 तक 35 ट्रिलियन डॉलर होने का लक्ष्य रखती है) अब अमेरिकियों को चुभने लगी है। भारत को रोकने के लिए अमेरिका कई मोर्चों पर काम कर रहा है:
- व्यापारिक बाधाएं: भारत के एक्सपोर्ट्स पर टैरिफ और कड़े नियम लगाना।
- क्षेत्रीय अस्थिरता: पाकिस्तान जैसे देशों के प्रति नरम रुख अपनाकर भारत को क्षेत्रीय विवादों में उलझाए रखना।
- प्रतिभा पलायन (Brain Drain): अमेरिका में बसे भारतीय टैलेंट और H-1B वीजा नीति के जरिए भारत के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करना。
निष्कर्ष: भारत के लिए आगे की राह
चीन ने इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अमेरिका असल में भारत को चीन के खिलाफ भड़काकर खुद का फायदा साधना चाहता है। ऐसे में भारत के लिए यह समय अपनी चुप्पी तोड़ने और एक दृढ़ स्टैंड लेने का है।
भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि उसका विकास किसी की ‘गलती’ का परिणाम नहीं, बल्कि उसकी अपनी क्षमता है। वैश्विक मंचों पर भारत को अपनी व्यापारिक नीतियों और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को लेकर और अधिक मुखर होने की आवश्यकता है ताकि कोई भी देश उसे अपनी शर्तों पर डिक्टेट न कर सके।