राजा, किसान और नगर आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Study Material : Delhi, NCERT Class-12 इतिहास अध्याय – 2 (लगभग 600 ई० पू० से 600 ई०) History Chapter 2 (C. 600 BCE -600 CE)
राजा, किसान और नगर आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ का संक्षिप्त सारांश (Kings, Peasants and Cities Brief Summary of Early States and Economies)
- हड़प्पा सभ्यता के बाद लगभग 1500 वर्षों के दौरान उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में अनेक प्रकार के विकास हुए, जैसे- ऋग्वेद का लेखन कार्य, कृषक बस्तियों का उदय, अंतिम संस्कार के नए तरीके, नए नगरों का उदय आदि।
- इस काल में हुए विकास (इतिहास) को जानने के मुख्य स्रोत अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के तथा चित्र हैं। अशोक के अभिलेख मुख्यतः ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपियों में हैं। इन लिपियों को ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा जिससे भारतीय इतिहास को एक नई दिशा मिली।
- आरंभिक भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी ई० पू० को एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकारी काल माना जाता है। इस काल को प्रायः आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों के विकास के साथ जोड़ा जाता है। इसी काल में बौद्ध तथा जैन धर्म सहित विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं का विकास हुआ
- बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में महाजनपद नाम से सोलह राज्यों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि महाजनपदों के नाम इन ग्रंथों में एक समान नहीं है। फिर भी वज्जि, मगध, कौशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवंति जैसे नाम प्रायः एकसमान हैं।
- छठी से चौथी शताब्दी ई० पू० में मगध सबसे शक्तिशाली महाजनपद बनकर उभरा। इसके पीछे कई कारण थे— लोहे के विशाल भंडार, हाथियों की उपलब्धता, सस्ता तथा सुगम आवागमन तथा राजाओं की महत्त्वाकांक्षा।
- 321 ई० पू० में चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की। उसका राज्य पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलोचिस्तान तक फैला हुआ था।
- चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र अशोक मौर्य वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसने मौर्य साम्राज्य में कलिंग का प्रदेश जोड़ा।
- मौर्य साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र थे- राजधानी पाटलिपुत्र तथा चार प्रांतीय केंद्र- तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि। इन सबका उल्लेख अशोक के अभिलेखों में मिलता है। – मेगस्थनीज के अनुसार मौर्यों की सैनिक गतिविधियों का संचालन एक समिति तथा छः उप-समितियाँ करती थी। इनमें से दूसरी उप-समिति सबसे महत्त्वपूर्ण थी।
- पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे लेखों को अभिलेख कहते हैं। अभिलेखों में उन लोगों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे जाते हैं जो उन्हें खुदवाते हैं।
- आरंभिक अभिलेख प्राकृत भाषाओं में लिखे जाते थे। प्राकृत जन-साधारण की भाषाएँ होती थीं। यह संभव है कि लोग अन्य भाषाएँ भी बोलते हों। परंतु इनका उपयोग लेखन कार्य में नहीं किया जाता था।
- उत्तर मौर्यकाल में राजा अपनी उच्च स्थिति को दर्शाने के लिए स्वयं दैवी रूप प्रस्तुत करने लगे। इसी उद्देश्य से कुषाण शासकों ने अपनी विशालकाय मूर्तियाँ बनवाईं और अपने नाम के साथ ‘देवपुत्र’ की उपाधि का प्रयोग किया।
- हरिषेण द्वारा लिखित इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का बखान करता है। इसमें उसे बहुत ही शक्तिशाली सम्राट बताया गया है।
- उत्तर मौर्यकाल में लोहे के हलों तथा कृत्रिम सिंचाई के प्रयोग से कृषि उत्पादन में काफी वृद्धि हुई जिससे राजाओं की आय बढ़ी।
- अभिलेखों से भूमिदान के प्रमाण मिले हैं। ऐसे दान प्रायः राजाओं तथा सरदारों द्वारा ब्राह्मणों तथा धार्मिक संस्थाओं को दिए जाते थे। दान में दी गई भूमि (अग्रहार) के सभी संसाधनों पर दान पाने वाले का अधिकार होता था।
- ग्रामीण प्रजा अधिकतर किसान थी। राजा किसानों से बड़े-बड़े करों की माँग करते थे। कर भी बड़ी कठोरता से वसूल किए जाते थे। इसी कारण राजा तथा ग्रामीण प्रजा के बीच संबंध प्रायः तनावपूर्ण रहते थे। कई किसान तंग आकर जंगल में भाग जाते थे।
- मनुस्मृति आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधि ग्रंथ है। यह संस्कृत भाषा में है जिसकी रचना 200 ई० पू० से 200 ई० के बीच हुई थी।
- हड़प्पा शहरों को छोड़कर कुछ किलेबंद नगरों से विभिन्न प्रकार के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें उच्चकोटि के मिट्टी के कटोरे तथा थालियाँ शामिल हैं जिन पर चमकदार कलई चढ़ी है। इन्हें उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र कहा जाता है। इनका उपयोग संभवतः धनी लोग करते थे।
- दूसरी शताब्दी ई०पू० में कुछ छोटे-छोटे अभिलेखों में विभिन्न लोगों द्वारा दिए गए दान का उल्लेख है। इन्हें दानात्मक अभिलेख कहते हैं।
- उत्पादकों तथा व्यापारियों के संघ को ‘श्रेणी’ कहा जाता था। ये श्रेणियाँ कच्चा माल खरीदती थीं और उससे सामान तैयार करके बाजार में बेचती थीं।
- शासकों की प्रतिमा तथा नाम के साथ सबसे पहले सिक्के हिंद-यूनानी शासकों ने जारी किए। वे दूसरी शताब्दी ई० पू० में उपमहाद्वीप के पूर्वोत्तर क्षेत्र पर शासन करते थे।
- सोने के सबसे पहले सिक्के प्रथम शताब्दी ई० में कुषाण शासकों ने जारी किए थे। इन सिक्कों का आकार और भार तत्कालीन रोमन सम्राटों तथा ईरान के पार्थियन शासकों द्वारा जारी सिक्कों के बिल्कुल समान था।
- अशोक ने ‘देवानांपिय’ तथा ‘पियदस्सी’ की उपाधियाँ धारण कीं। ‘देवानांपिय’ का अर्थ है- देवताओं का प्रिय ‘पियदस्सी’ का अर्थ है- देखने में सुंदर।
- अशोक के सिंह शीर्ष को भारत सरकार ने राज्य चिह्न के रूप में अपनाया है। यह हमारी एकता, वीरता, प्रगति तथा उच्च आदशों का प्रतीक हैं। इन्हीं बातों के कारण सिंह शीर्ष को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
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