6 विज्ञान अध्याय 10 – सजीव विशेषताओं का अन्वेषण | Exploring the characteristics of living things

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6 विज्ञान अध्याय 10 – सजीव विशेषताओं का अन्वेषण | Exploring the characteristics of living things

हमारे आसपास अनेक प्रकार की वस्तुएँ होती हैं। इनमें कुछ सजीव होती हैं, जैसे मनुष्य, पशु-पक्षी और पौधे, जबकि कुछ निर्जीव होती हैं, जैसे पेंसिल, पुस्तक, कुर्सी और पत्थर। इस अध्याय में यह समझाया गया है कि सजीवों को निर्जीव वस्तुओं से किस प्रकार अलग पहचाना जा सकता है और सजीवों के जीवन में कौन-कौन-सी विशेषताएँ होती हैं।

सजीवों की प्रमुख विशेषताएँ

केवल गति करना ही सजीव होने का प्रमाण नहीं है। उदाहरण के लिए, कार अपने आप सड़क पर चलती हुई दिखाई देती है, लेकिन वह सजीव नहीं है। इसके विपरीत पौधे एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जा सकते, फिर भी उनमें गति होती है। फूलों का खिलना, लताओं का किसी वस्तु के चारों ओर लिपटना और कुछ कीटभक्षी पौधों की पत्तियों का कीट के स्पर्श पर मुड़ना पौधों में गति के उदाहरण हैं।

सजीवों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. गति – सभी सजीव किसी न किसी प्रकार की गति प्रदर्शित करते हैं।
  2. पोषण – सजीवों को वृद्धि और विकास के लिए भोजन या पोषक पदार्थों की आवश्यकता होती है।
  3. वृद्धि – सजीवों के शरीर में समय के साथ वृद्धि होती है।
  4. श्वसन – सभी सजीव श्वसन करते हैं। मनुष्य और जंतु वायु लेते और छोड़ते हैं। पौधों की पत्तियों में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें रंध्र कहते हैं; इनके द्वारा गैसों का आदान-प्रदान होता है।
  5. उत्सर्जन – शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना उत्सर्जन कहलाता है। मनुष्य में पसीना और मूत्र इसके उदाहरण हैं। पौधे भी अतिरिक्त जल और कुछ पदार्थों का उत्सर्जन करते हैं।
  6. उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया – कोई वस्तु या घटना जो सजीव को प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करे, उसे उद्दीपन कहते हैं। जैसे गर्म वस्तु छूने पर हाथ पीछे खींच लेना। छुई-मुई को छूने पर उसकी पत्तियाँ बंद हो जाती हैं।
  7. जनन – अपनी तरह के नए जीवों को उत्पन्न करने की प्रक्रिया जनन कहलाती है। यह जीवन की निरंतरता के लिए आवश्यक है।
  8. मृत्यु – जीवन की सभी गतिविधियाँ समाप्त हो जाने पर सजीव की मृत्यु हो जाती है।

इस प्रकार गति, पोषण, वृद्धि, श्वसन, उत्सर्जन, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया, जनन और अंततः मृत्यु सजीवों की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

बीज का अंकुरण

बीज भी सजीव होता है। उचित परिस्थितियाँ मिलने पर बीज से नया पौधा निकलता है। बीज के अंकुरण के लिए मुख्य रूप से उचित मात्रा में जल और वायु आवश्यक हैं। अध्याय में किए गए प्रयोग से यह भी स्पष्ट होता है कि अधिकांश फली के बीजों के अंकुरण के लिए सूर्य का प्रकाश अनिवार्य नहीं होता। अंकुरण के बाद नवोद्भिद की वृद्धि के लिए सूर्य का प्रकाश आवश्यक होता है।

जल बीज के बाहरी आवरण अर्थात बीजावरण को मुलायम करता है और अंदर स्थित भ्रूण को विकसित होने में सहायता करता है। बीज मिट्टी के कणों के बीच उपस्थित वायु का उपयोग करते हैं। बहुत अधिक जल होने पर मिट्टी के बीच वायु की उपलब्धता कम हो सकती है, जिससे अंकुरण प्रभावित होता है।

कुछ पौधों के बीजों को अंकुरण के लिए विशेष प्रकाश या अंधकार की आवश्यकता भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, अध्याय में कॉलियस और पिटूनिया के बीजों के लिए प्रकाश तथा कैलेंडुला और जीनिया के बीजों के लिए अंधकार की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है।

पौधों में वृद्धि और गति

पौधों में वृद्धि और गति दोनों दिखाई देती हैं। पौधे का प्ररोह सामान्यतः ऊपर की ओर बढ़ता है और सूर्य के प्रकाश की दिशा में वृद्धि करता है, जबकि जड़ नीचे की ओर बढ़ती है। यदि पौधे को उल्टा भी रखा जाए, तो जड़ नीचे की ओर और प्ररोह ऊपर की ओर मुड़कर बढ़ने लगते हैं।

भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने पौधों की वृद्धि और उद्दीपन के प्रति उनकी अनुक्रिया का अध्ययन किया। उन्होंने क्रेस्कोग्राफ नामक यंत्र बनाया, जिससे पौधों की वृद्धि को मापा जा सकता था।

पौधे का जीवन-चक्र

एक पौधे का जीवन बीज से शुरू होता है। बीज अंकुरित होकर छोटा पौधा बनता है। उसमें पत्तियाँ विकसित होती हैं, फिर फूल आते हैं। फूलों के बाद फल बनते हैं और फलों में नए बीज बनते हैं। ये बीज आगे नए पौधों को जन्म देते हैं।

इस प्रकार बीज → अंकुरण → पौधा → फूल → फल और बीज → नया पौधा का क्रम पौधे का जीवन-चक्र कहलाता है। अंत में पौधा वृद्ध होकर मर जाता है।

जंतुओं का जीवन-चक्र

जंतु भी अपने जीवन में विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं। अलग-अलग जंतुओं के जीवन-चक्र अलग हो सकते हैं।

मच्छर का जीवन-चक्र

मच्छर के जीवन की चार मुख्य अवस्थाएँ हैं—

अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क मच्छर

मादा मच्छर जल में या जल के पास अंडे देती है। अंडों से लार्वा निकलते हैं, फिर लार्वा प्यूपा में बदलते हैं और अंत में प्यूपा से वयस्क मच्छर निकलता है। मच्छरों के प्रजनन को रोकने के लिए घर और आसपास पानी जमा नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि स्थिर जल उनके जीवन-चक्र के लिए उपयुक्त स्थान बन सकता है।

मेंढक का जीवन-चक्र

मेंढक के जीवन-चक्र में मुख्य रूप से चार अवस्थाएँ होती हैं—

अंडा/जलांडक → टैडपोल → मंडूकक (फ्रॉगलेट) → वयस्क मेंढक

टैडपोल की पूँछ होती है, जो उसे पानी में तैरने में सहायता करती है। धीरे-धीरे उसके पैर विकसित होते हैं और वह मंडूकक में बदलता है। आगे उसकी पूँछ लुप्त हो जाती है और पैर मजबूत हो जाते हैं। अंततः वह वयस्क मेंढक बन जाता है, जो जल और स्थल दोनों पर रह सकता है।

अध्याय का मुख्य निष्कर्ष

सजीवों की पहचान उनकी विभिन्न जीवन-क्रियाओं से की जाती है। वे गति करते हैं, पोषण प्राप्त करते हैं, बढ़ते हैं, श्वसन करते हैं, उत्सर्जन करते हैं, उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं, जनन करते हैं और अंततः मृत्यु को प्राप्त होते हैं। पौधे और जंतु अपने जीवन-काल में अनेक अवस्थाओं से गुजरते हैं। बीज का अंकुरण उचित परिस्थितियों पर निर्भर करता है। पौधों और जंतुओं के जीवन-चक्र को समझने से हमें जीवन की निरंतरता और सजीव जगत की विविधता को समझने में सहायता मिलती है। हमें सजीवों तथा उनके आवासों की रक्षा करनी चाहिए।

पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. पौधों और जंतुओं के जीवन-चक्र में समानताएँ और भिन्नताएँ सूचीबद्ध कीजिए।

उत्तर:

समानताएँ—

  1. पौधे और जंतु दोनों सजीव हैं।
  2. दोनों अपने जीवन-काल में वृद्धि और विकास करते हैं।
  3. दोनों अपने जीवन में विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हैं।
  4. दोनों जनन करते हैं और अपनी प्रजाति की निरंतरता बनाए रखते हैं।
  5. अंत में दोनों की मृत्यु होती है।

भिन्नताएँ—

  1. पौधों का जीवन-चक्र सामान्यतः बीज से शुरू होकर पौधा, फूल, फल और नए बीज बनने तक चलता है।
  2. जंतुओं के जीवन-चक्र में जन्म, वृद्धि, वयस्क अवस्था और मृत्यु जैसी अवस्थाएँ होती हैं।
  3. कुछ जंतुओं, जैसे मच्छर और मेंढक, के जीवन-चक्र में शरीर की आकृति और संरचना में बहुत अधिक परिवर्तन होते हैं।
  4. पौधों में फूल और फल बनने की अवस्थाएँ होती हैं, जबकि जंतुओं में ऐसी अवस्थाएँ नहीं होतीं।

प्रश्न 2. नीचे दी गई तालिका में दी गई स्थितियों के लिए उपयुक्त उदाहरण दीजिए। यदि किसी स्थिति के लिए उदाहरण संभव नहीं है, तो स्पष्ट कीजिए कि ऐसा क्यों है।

क्रम सं.क्या वृद्धि होती है?क्या श्वसन होता है?उदाहरणटिप्पणी
1.नहींनहींपत्थरयह निर्जीव है।
2.नहींहाँऐसा कोई सामान्य सजीव उदाहरण नहींसजीवों में वृद्धि जीवन की प्रमुख विशेषता है।
3.हाँनहींऐसा कोई सजीव उदाहरण नहींकेवल बढ़ना सजीव होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है।
4.हाँहाँपौधा/जंतुये सजीव हैं और इनमें वृद्धि तथा श्वसन दोनों होते हैं।

अतः केवल किसी एक विशेषता के आधार पर सजीव और निर्जीव में अंतर करना पर्याप्त नहीं है। सजीवों में अनेक जीवन-क्रियाएँ होती हैं। अध्याय में गति, पोषण, वृद्धि, श्वसन, उत्सर्जन, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया, जनन और मृत्यु को सजीवों की प्रमुख विशेषताओं के रूप में बताया गया है।


प्रश्न 3. आपने सीखा है कि बीजों के अंकुरण के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। अनाजों और दालों के उचित भंडारण के लिए हम इस ज्ञान का उपयोग किस प्रकार कर सकते हैं?

उत्तर:
बीजों के अंकुरण के लिए मुख्य रूप से उचित जल और वायु की आवश्यकता होती है। इसलिए अनाजों और दालों को ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जहाँ नमी न हो।

उन्हें अच्छी तरह सुखाकर और नमी से बचाकर रखना चाहिए। यदि अनाज या दालों में नमी पहुँच जाएगी तो उनमें अंकुरण शुरू हो सकता है तथा वे खराब भी हो सकते हैं। इसलिए भंडारण के दौरान उन्हें सूखा रखना और नमी से बचाना आवश्यक है।


प्रश्न 4. आपने सीखा है कि टैडपोल की एक पूँछ होती है, लेकिन जब वृद्धि के बाद यह मेंढक बनता है तो पूँछ लुप्त हो जाती है। टैडपोल अवस्था में पूँछ होने से क्या लाभ मिलता है?

उत्तर:
टैडपोल मुख्य रूप से पानी में रहता है। उसकी पूँछ उसे जल में तैरने और गति करने में सहायता करती है। जैसे-जैसे टैडपोल का विकास होता है, उसके पैर विकसित होने लगते हैं और वह मंडूकक में बदलता है।

बाद में उसकी पूँछ धीरे-धीरे लुप्त हो जाती है और पैर मजबूत हो जाते हैं। वयस्क मेंढक जल और स्थल दोनों पर रह सकता है।


प्रश्न 5. चरण का कहना है कि लकड़ी का लट्ठा निर्जीव है क्योंकि इसमें गति नहीं होती। इसके विपरीत छा उसे सजीव मानती हैं, क्योंकि यह वृक्षों से प्राप्त होता है। चरण और छा के कथनों के पक्ष या विपक्ष में अपने तर्क दीजिए।

उत्तर:
चरण का निष्कर्ष उचित है कि लकड़ी का लट्ठा निर्जीव है, लेकिन केवल गति न होने के कारण उसे निर्जीव कहना पर्याप्त आधार नहीं है। सजीव और निर्जीव में अंतर करने के लिए अन्य जीवन-क्रियाओं को भी देखना चाहिए।

जीवित वृक्ष में वृद्धि, श्वसन, पोषण, उत्सर्जन, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया और जनन जैसी जीवन-क्रियाएँ होती हैं। लकड़ी के लट्ठे में ये जीवन-क्रियाएँ नहीं होतीं।

इसलिए लकड़ी का लट्ठा निर्जीव है। वह वृक्ष से प्राप्त हुआ है, लेकिन वृक्ष का कोई निर्जीव भाग स्वयं सजीव नहीं होता।


प्रश्न 6. मच्छर और मेंढक के जीवन-चक्र में क्या समानताएँ और क्या विभेदकारी विशेषताएँ होती हैं?

उत्तर:

समानताएँ—

  1. दोनों का जीवन-चक्र अंडे से शुरू होता है।
  2. दोनों में विकास के दौरान शरीर की आकृति और संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं।
  3. दोनों के जीवन-चक्र में जल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  4. दोनों में कई अलग-अलग अवस्थाएँ होती हैं।

भिन्नताएँ—

मच्छर:
अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क मच्छर।

मेंढक:
अंडा/जलांडक → टैडपोल → मंडूकक → वयस्क मेंढक।

मच्छर में प्यूपा अवस्था होती है, जबकि मेंढक में टैडपोल और मंडूकक अवस्थाएँ होती हैं। वयस्क मेंढक जल और स्थल दोनों पर रह सकता है।


प्रश्न 7. एक पौधे को उसकी वृद्धि के लिए उपयुक्त सभी परिस्थितियाँ उपलब्ध कराई गई हैं। एक सप्ताह बाद आप इस पौधे के प्ररोह और जड़ में क्या देखने की अपेक्षा करते हैं? इसका कारण लिखिए।

उत्तर:
एक सप्ताह बाद पौधे के प्ररोह के ऊपर की ओर और जड़ के नीचे की ओर बढ़ने की अपेक्षा की जाती है।

पौधे को सीधा रखने पर जड़ नीचे की दिशा में तथा प्ररोह ऊपर की दिशा में वृद्धि करते हैं। पौधे को पर्याप्त जल, वायु और अन्य आवश्यक परिस्थितियाँ मिलने पर उसकी वृद्धि जारी रहती है।

अध्याय में किए गए प्रयोग से यह भी देखा गया कि पौधे की जड़ और प्ररोह अपनी-अपनी विशिष्ट दिशाओं में वृद्धि करते हैं।


प्रश्न 8. तारा और विजय ने चित्र 10.10 में दिखाया गया प्रयोग का सेट-अप तैयार किया है। आप क्या सोचते हैं कि वे क्या पता करना चाहते हैं? और उन्हें यह कैसे पता चलेगा कि वे सही हैं?

उत्तर:
वे इस प्रयोग के माध्यम से यह पता करना चाहते हैं कि बीज के अंकुरण के लिए किन परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से तापमान का अंकुरण पर क्या प्रभाव पड़ता है।

इसे पता करने के लिए समान प्रकार और समान संख्या में बीज लेकर उन्हें अलग-अलग तापमान वाली परिस्थितियों में रखा जा सकता है। अन्य परिस्थितियाँ, जैसे जल और वायु की उपलब्धता, समान रखनी चाहिए।

कुछ दिनों तक सभी बीजों का नियमित अवलोकन करके यह देखा जाएगा कि किन परिस्थितियों में कितने बीज अंकुरित हुए। परिणामों की तुलना करके निष्कर्ष निकाला जा सकता है।


प्रश्न 9. बीज अंकुरण पर तापमान के प्रभाव की जाँच करने के लिए एक प्रयोग की योजना लिखिए।

उत्तर:

प्रयोग की योजना—

  1. एक ही प्रकार के कुछ समान बीज लें।
  2. बीजों को समान संख्या में दो या तीन समूहों में बाँटें।
  3. प्रत्येक समूह को समान मात्रा में जल और वायु उपलब्ध कराएँ।
  4. अलग-अलग समूहों को अलग-अलग तापमान वाली परिस्थितियों में रखें।
  5. अन्य सभी परिस्थितियों को समान रखें, ताकि केवल तापमान का प्रभाव जाँचा जा सके।
  6. प्रतिदिन बीजों का अवलोकन करें और अंकुरित बीजों की संख्या लिखें।
  7. कुछ दिनों के बाद सभी समूहों के परिणामों की तुलना करें।
  8. जिस तापमान पर अंकुरण अधिक और उचित रूप से हुआ, उसके आधार पर तापमान के प्रभाव के बारे में निष्कर्ष निकालें।

इस प्रकार एक समय में एक ही कारक अर्थात तापमान को बदलकर प्रयोग का निष्पक्ष परिणाम प्राप्त किया जा सकता है।

याद रखने योग्य मुख्य उत्तर

  • मच्छर का जीवन-चक्र: अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क।
  • मेंढक का जीवन-चक्र: अंडा/जलांडक → टैडपोल → मंडूकक → वयस्क।
  • फली के पौधे का जीवन-चक्र: बीज → अंकुरण → पत्तियाँ → फूल → फल/बीज → नया पौधा।
  • टैडपोल की पूँछ: पानी में तैरने में सहायता करती है।
  • जड़: सामान्यतः नीचे की ओर बढ़ती है।
  • प्ररोह: सामान्यतः ऊपर की ओर बढ़ता है।
  • बीज अंकुरण: जल और वायु आवश्यक हैं; विभिन्न बीजों में प्रकाश/अंधकार की आवश्यकता अलग हो सकती है।
  • सजीवों की प्रमुख विशेषताएँ: गति, पोषण, वृद्धि, श्वसन, उत्सर्जन, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया, जनन और मृत्यु।

अतिरिक्त प्रश्नोत्तर

1. सजीव किसे कहते हैं?

उत्तर: जिन वस्तुओं में जीवन की विशेषताएँ पाई जाती हैं, उन्हें सजीव कहते हैं। सजीव गति करते हैं, भोजन प्राप्त करते हैं, वृद्धि करते हैं, श्वसन करते हैं, उत्सर्जन करते हैं, उद्दीपन के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं और जनन करते हैं।

2. सजीवों की प्रमुख विशेषताएँ कौन-कौन सी हैं?

उत्तर: सजीवों की प्रमुख विशेषताएँ हैं—गति, पोषण, वृद्धि, श्वसन, उत्सर्जन, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया, जनन और अंततः मृत्यु।

3. क्या केवल गति के आधार पर किसी वस्तु को सजीव कहा जा सकता है?

उत्तर: नहीं। केवल गति सजीव होने का प्रमाण नहीं है। पौधे अपने स्थान पर रहते हुए भी विभिन्न प्रकार की गति प्रदर्शित करते हैं। इसलिए सजीव की पहचान के लिए अन्य जीवन-लक्षणों को भी देखना आवश्यक है।

4. पौधे गति कैसे प्रदर्शित करते हैं?

उत्तर: पौधे अपने अंगों की वृद्धि और दिशा में परिवर्तन के द्वारा गति प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए, पौधे का तना सामान्यतः ऊपर की ओर और जड़ नीचे की ओर बढ़ती है।

5. बीज का अंकुरण क्या है?

उत्तर: अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर बीज से नए पौधे का निकलना बीज का अंकुरण कहलाता है।

6. बीज के अंकुरण के लिए कौन-सी परिस्थितियाँ आवश्यक हैं?

उत्तर: बीज के अंकुरण के लिए उचित मात्रा में जल और वायु आवश्यक हैं। अध्याय में दिए गए प्रयोगों से यह समझा जाता है कि बहुत अधिक जल भी अंकुरण के लिए उचित नहीं होता।

7. क्या बीज के अंकुरण के लिए सूर्य का प्रकाश अनिवार्य है?

उत्तर: अध्याय में किए गए अवलोकन के अनुसार बीज के अंकुरण के लिए जल और वायु महत्वपूर्ण हैं। सभी बीजों के लिए सूर्य का प्रकाश अंकुरण की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।

8. बीजों को सूखा रखने की सलाह क्यों दी जाती है?

उत्तर: नमी मिलने पर बीज अंकुरित हो सकते हैं। इसलिए अनाज और दालों को सूखी जगह पर रखना चाहिए, ताकि उनमें अनचाहा अंकुरण न हो।

9. अत्यधिक जल बीज के लिए हानिकारक क्यों हो सकता है?

उत्तर: बीज के अंकुरण के लिए जल के साथ वायु भी आवश्यक है। अत्यधिक जल होने पर बीजों को पर्याप्त वायु नहीं मिल सकती, इसलिए अंकुरण प्रभावित हो सकता है।

10. वृद्धि से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: किसी सजीव के आकार या उसके शरीर के विभिन्न भागों में समय के साथ होने वाली वृद्धि को वृद्धि कहते हैं।

11. पौधे की जड़ और तने की वृद्धि की दिशा कैसी होती है?

उत्तर: सामान्यतः पौधे का तना ऊपर की ओर और जड़ नीचे की ओर बढ़ती है। यह पौधे की दिशात्मक वृद्धि को दर्शाता है।

12. यदि किसी पौधे को उल्टा कर दिया जाए तो क्या होगा?

उत्तर: पौधा अपनी वृद्धि की दिशा में परिवर्तन करते हुए फिर से सामान्य दिशा में बढ़ने का प्रयास करेगा। उसकी जड़ नीचे और तना ऊपर की ओर बढ़ेगा।

13. पौधों की वृद्धि का अध्ययन करने वाले प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक कौन थे?

उत्तर: जगदीश चंद्र बोस ने पौधों की वृद्धि और उनकी प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया था।

14. जगदीश चंद्र बोस ने पौधों के अध्ययन के लिए किस उपकरण का विकास किया?

उत्तर: उन्होंने पौधों की बहुत छोटी वृद्धि को मापने के लिए क्रेस्कोग्राफ (Crescograph) नामक उपकरण विकसित किया था।

15. जीवन-चक्र क्या होता है?

उत्तर: किसी सजीव के जीवन में जन्म या आरंभ से लेकर वृद्धि, विकास, जनन और मृत्यु तक होने वाले विभिन्न चरणों के क्रम को जीवन-चक्र कहते हैं।

16. पौधे का सामान्य जीवन-चक्र लिखिए।

उत्तर:
बीज → अंकुरण → पौधा → फूल → फल और बीज → नया पौधा।

17. पौधों में जनन का क्या महत्व है?

उत्तर: जनन से नए पौधे उत्पन्न होते हैं। इससे सजीवों की पीढ़ियाँ आगे बढ़ती हैं और जीवन की निरंतरता बनी रहती है।

18. मच्छर का जीवन-चक्र लिखिए।

उत्तर: मच्छर का जीवन-चक्र चार मुख्य चरणों में पूरा होता है—
अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क मच्छर।

19. मेंढक का जीवन-चक्र लिखिए।

उत्तर: मेंढक के जीवन-चक्र में मुख्य चरण हैं—
अंडे/जलांडक → टैडपोल → मेंढक का बच्चा → वयस्क मेंढक।

20. टैडपोल की पूँछ का क्या महत्व है?

उत्तर: टैडपोल पानी में रहता है और उसकी पूँछ उसे पानी में तैरने तथा गति करने में सहायता करती है।

21. टैडपोल में आगे चलकर क्या परिवर्तन होता है?

उत्तर: टैडपोल धीरे-धीरे विकसित होकर मेंढक के रूप में बदलता है। इस दौरान उसके शरीर में परिवर्तन होते हैं और उसकी पूँछ समाप्त हो जाती है।

22. मच्छरों की संख्या कम करने के लिए क्या उपाय किया जा सकता है?

उत्तर: घरों और आसपास पानी को लंबे समय तक जमा नहीं रहने देना चाहिए। रुके हुए पानी में मच्छर प्रजनन कर सकते हैं, इसलिए पानी के जमाव को रोकना उपयोगी उपाय है।

23. श्वसन सजीवों के लिए क्यों आवश्यक है?

उत्तर: श्वसन सजीवों की एक प्रमुख जीवन-प्रक्रिया है। इससे शरीर में जीवन-क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

24. उत्सर्जन क्या है?

उत्तर: शरीर में बनी अनावश्यक या अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। यह सजीवों की महत्वपूर्ण जीवन-प्रक्रिया है।

25. उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: बाहरी वातावरण में होने वाले किसी परिवर्तन या उद्दीपन के प्रति सजीव द्वारा प्रतिक्रिया करना उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया कहलाता है।

26. जनन क्यों आवश्यक है?

उत्तर: जनन नए जीवों को उत्पन्न करता है। इससे सजीवों की नई पीढ़ी बनती है और जीवन की निरंतरता बनी रहती है।

27. क्या सभी सजीव एक ही प्रकार से जनन करते हैं?

उत्तर: नहीं। अलग-अलग सजीवों में जनन की प्रक्रिया अलग हो सकती है। पौधों और विभिन्न जंतुओं के जीवन-चक्र भी अलग-अलग चरणों में दिखाई देते हैं।

28. निर्जीव वस्तु और मृत जीव में क्या अंतर है?

उत्तर: निर्जीव वस्तु में कभी जीवन-प्रक्रियाएँ नहीं होतीं, जबकि मृत जीव पहले सजीव था और उसमें जीवन की प्रक्रियाएँ होती थीं, लेकिन मृत्यु के बाद वे समाप्त हो जाती हैं।

29. लकड़ी का लट्ठा निर्जीव क्यों माना जाता है?

उत्तर: लकड़ी का लट्ठा कभी जीवित पेड़ का हिस्सा था, लेकिन पेड़ से अलग होने के बाद उसमें जीवन की आवश्यक प्रक्रियाएँ नहीं होतीं। इसलिए उसे निर्जीव माना जाता है।

30. सजीव की पहचान के लिए केवल एक विशेषता पर निर्भर रहना उचित क्यों नहीं है?

उत्तर: क्योंकि कोई एक विशेषता अकेले सजीव की पहचान के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, केवल गति को लें तो पौधों की स्थिति स्पष्ट नहीं होगी। इसलिए सजीव की पहचान करते समय अनेक जीवन-लक्षणों को ध्यान में रखना चाहिए।

परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न: बीज के अंकुरण और पौधे के विकास में क्या अंतर है?
उत्तर: बीज के अंदर से अंकुर निकलने की प्रक्रिया को अंकुरण कहते हैं। इसके बाद अंकुर धीरे-धीरे बढ़कर पौधे का रूप लेता है। इसलिए अंकुरण पौधे के जीवन-चक्र का प्रारंभिक चरण है, जबकि वृद्धि उसके बाद होने वाली निरंतर प्रक्रिया है।

प्रश्न: पौधे और जंतु के जीवन-चक्र में एक समानता और एक अंतर लिखिए।
उत्तर: दोनों सजीव हैं, वृद्धि करते हैं और जनन द्वारा अपनी अगली पीढ़ी उत्पन्न करते हैं। अंतर यह है कि पौधों के जीवन-चक्र में बीज, अंकुरण, फूल और फल जैसे चरण होते हैं, जबकि जंतुओं में उनके प्रकार के अनुसार अलग-अलग विकासात्मक चरण पाए जाते हैं।

प्रश्न: सजीवों में मृत्यु क्यों होती है?
उत्तर: सजीव अपने जीवन में विभिन्न जीवन-प्रक्रियाएँ करते हैं। एक समय के बाद जीव इन जीवन-प्रक्रियाओं को आगे जारी रखने में सक्षम नहीं रहता। तब उसे मृत कहा जाता है। अध्याय के अनुसार भोजन, वायु और जल उपलब्ध होने पर भी जब जीव जीवन के आवश्यक लक्षण प्रदर्शित करने में सक्षम नहीं रहता, तो वह मृत होता है।

अतिरिक्त दीर्घ प्रश्नोत्तर

1. सजीवों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
सजीवों में कुछ ऐसी सामान्य विशेषताएँ होती हैं, जिनके आधार पर उन्हें निर्जीव वस्तुओं से अलग पहचाना जा सकता है। सजीव गति करते हैं, उन्हें भोजन की आवश्यकता होती है, वे वृद्धि करते हैं और श्वसन करते हैं। वे शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालते हैं, बाहरी उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं और जनन द्वारा अपनी अगली पीढ़ी उत्पन्न करते हैं। अंततः प्रत्येक सजीव की मृत्यु होती है। इन सभी जीवन-प्रक्रियाओं को मिलाकर सजीवों की पहचान की जाती है।

2. केवल गति के आधार पर किसी वस्तु को सजीव क्यों नहीं कहा जा सकता?

उत्तर:
केवल गति सजीव होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है। कई निर्जीव वस्तुएँ भी गति करती हुई दिखाई दे सकती हैं, जैसे वाहन या हवा से उड़ती वस्तुएँ। दूसरी ओर पौधे अपना स्थान बदले बिना भी गति प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए, पौधे की जड़ और तना वृद्धि करते हुए अपनी दिशा में परिवर्तन करते हैं। इसलिए किसी वस्तु को सजीव मानने के लिए केवल गति नहीं, बल्कि पोषण, वृद्धि, श्वसन, उत्सर्जन, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया और जनन जैसी अन्य जीवन-विशेषताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।

3. बीज के अंकुरण के लिए आवश्यक परिस्थितियों को प्रयोग द्वारा समझाइए।

उत्तर:
बीज के अंकुरण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ आवश्यक होती हैं। अलग-अलग गमलों में समान प्रकार के बीज रखकर उन्हें अलग-अलग मात्रा में जल दिया जा सकता है। कुछ बीजों को उचित मात्रा में जल और वायु मिलेगी, जबकि कुछ को बहुत अधिक जल मिलेगा। कुछ दिनों तक उनके अंकुरण का नियमित अवलोकन किया जाता है। इससे यह समझा जा सकता है कि बीज के अंकुरण के लिए जल और वायु आवश्यक हैं तथा जल की उचित मात्रा महत्वपूर्ण है। अध्याय में 7–10 दिनों तक नियमित अवलोकन करने के लिए कहा गया है।

4. अनाज और दालों को सूखा रखकर संग्रहित करना क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
बीजों के अंकुरण के लिए जल और वायु जैसी अनुकूल परिस्थितियाँ आवश्यक होती हैं। यदि अनाज या दालों में नमी पहुँच जाए तो उनमें अंकुरण शुरू हो सकता है। इससे उनका संग्रहण प्रभावित हो सकता है। इसलिए अनाज और दालों को अच्छी तरह सुखाकर, नमी से बचाकर और उचित स्थान पर रखना चाहिए। इस प्रकार अंकुरण की प्रक्रिया को रोका जा सकता है और खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

5. पौधे की वृद्धि की दिशा को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर:
पौधे के अलग-अलग भाग सामान्यतः निश्चित दिशाओं में बढ़ते हैं। तना और उसकी शाखाएँ सामान्यतः ऊपर तथा जड़ नीचे की ओर बढ़ती है। यदि किसी पौधे को उल्टा कर दिया जाए, तब भी कुछ समय बाद उसकी जड़ नीचे और तना ऊपर की ओर बढ़ने लगता है। इससे पता चलता है कि पौधे की वृद्धि दिशा के प्रति प्रतिक्रिया करती है। पौधे की वृद्धि का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने पौधों की वृद्धि और उनकी प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया था। उन्होंने बहुत छोटी वृद्धि को मापने के लिए क्रेस्कोग्राफ उपकरण विकसित किया था।

6. पौधे के जीवन-चक्र का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।

उत्तर:
पौधे का जीवन-चक्र सामान्यतः बीज से शुरू होता है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर बीज अंकुरित होता है और उससे एक छोटा पौधा निकलता है। पौधा धीरे-धीरे वृद्धि करके बड़ा होता है। वयस्क पौधे में फूल आते हैं। फूलों के बाद फल और नए बीज बनते हैं। ये नए बीज अनुकूल परिस्थितियों में फिर अंकुरित होकर नए पौधों को जन्म देते हैं। इस प्रकार पौधे का जीवन-चक्र चलता रहता है।

क्रम:
बीज → अंकुरण → छोटा पौधा → वयस्क पौधा → फूल → फल एवं बीज → नया पौधा

7. मच्छर के जीवन-चक्र का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर:
मच्छर का जीवन-चक्र कई चरणों में पूरा होता है। मच्छर अंडे देता है। अंडों से लार्वा निकलता है। लार्वा पानी में रहता है और धीरे-धीरे विकसित होता है। इसके बाद वह प्यूपा अवस्था में पहुँचता है। प्यूपा से वयस्क मच्छर निकलता है। वयस्क मच्छर आगे जनन करता है और अंडे देता है। इस प्रकार मच्छर का जीवन-चक्र निरंतर चलता रहता है।

क्रम:
अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क मच्छर

8. मेंढक के जीवन-चक्र को समझाइए।

उत्तर:
मेंढक के जीवन-चक्र की शुरुआत अंडों से होती है। अंडों से टैडपोल निकलते हैं, जिन्हें जलांडक भी कहा जाता है। टैडपोल पानी में रहते हैं और उनकी पूँछ उन्हें तैरने में सहायता करती है। धीरे-धीरे उनके शरीर में परिवर्तन होते हैं और पैर विकसित होने लगते हैं। विकास के साथ वे मेंढक के बच्चे और फिर वयस्क मेंढक बन जाते हैं। वयस्क मेंढक जनन करता है और फिर नए अंडे बनते हैं।

क्रम:
अंडे/जलांडक → टैडपोल → मेंढक का बच्चा → वयस्क मेंढक

9. मच्छर और मेंढक के जीवन-चक्र में समानताएँ और अंतर लिखिए।

उत्तर:
मच्छर और मेंढक दोनों जंतु हैं और दोनों के जीवन-चक्र में अलग-अलग विकासात्मक अवस्थाएँ होती हैं। दोनों के जीवन-चक्र की शुरुआत अंडों से होती है और उनके विकास के दौरान उनके शरीर में परिवर्तन होते हैं। दोनों के प्रारंभिक विकास में जल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

अंतर:
मच्छर का जीवन-चक्र अंडा → लार्वा → प्यूपा → वयस्क होता है। इसके विपरीत मेंढक का जीवन-चक्र अंडे/जलांडक → टैडपोल → मेंढक का बच्चा → वयस्क मेंढक होता है। मच्छर में प्यूपा अवस्था आती है, जबकि मेंढक के जीवन-चक्र में टैडपोल अवस्था प्रमुख होती है।

10. टैडपोल की पूँछ उसके लिए क्यों उपयोगी होती है और बाद में उसका क्या होता है?

उत्तर:
टैडपोल मेंढक के जीवन-चक्र की एक अवस्था है और वह पानी में रहता है। उसकी पूँछ उसे पानी में तैरने तथा आगे बढ़ने में सहायता करती है। जैसे-जैसे टैडपोल का विकास होता है, उसके शरीर में कई परिवर्तन होते हैं और पैर विकसित होने लगते हैं। वयस्क मेंढक बनने की प्रक्रिया में उसकी पूँछ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। इस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं के लिए उपयोगी होते हैं।

11. पौधों और जंतुओं के जीवन-चक्र में क्या समानताएँ और अंतर हैं?

उत्तर:
पौधों और जंतुओं दोनों के जीवन में जन्म या जीवन की शुरुआत, वृद्धि, विकास, जनन और मृत्यु जैसी अवस्थाएँ होती हैं। दोनों में जनन द्वारा अगली पीढ़ी उत्पन्न होती है और जीवन-चक्र आगे बढ़ता है।

पौधों के जीवन-चक्र में बीज, अंकुरण, पौधा, फूल, फल और नए बीज जैसे चरण पाए जाते हैं। जंतुओं में उनके प्रकार के अनुसार जन्म, वृद्धि, विकास और वयस्क अवस्था होती है। कुछ जंतुओं में मच्छर और मेंढक की तरह अलग-अलग विकासात्मक अवस्थाएँ भी दिखाई देती हैं।

12. मृत जीव और निर्जीव वस्तु में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
निर्जीव वस्तु में जीवन-प्रक्रियाएँ नहीं होतीं और वह कभी सजीव नहीं रही होती। इसके विपरीत मृत जीव पहले सजीव था, लेकिन मृत्यु के बाद उसमें जीवन की प्रक्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, पेड़ से प्राप्त लकड़ी का लट्ठा पहले पेड़ के जीवित भाग का हिस्सा था, लेकिन अलग होने के बाद उसमें सजीवों की जीवन-प्रक्रियाएँ नहीं होतीं। इसलिए वर्तमान स्थिति के आधार पर वह निर्जीव माना जाता है। अध्याय में बताया गया है कि भोजन, वायु और जल उपलब्ध होने पर भी यदि कोई जीव जीवन के आवश्यक लक्षण प्रदर्शित नहीं करता, तो उसे मृत कहा जाता है।

13. जगदीश चंद्र बोस का पौधों के अध्ययन में क्या योगदान था?

उत्तर:
जगदीश चंद्र बोस ने पौधों की वृद्धि और उनकी प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया। उन्होंने यह समझने का प्रयास किया कि पौधे विभिन्न परिस्थितियों में किस प्रकार प्रतिक्रिया करते हैं। पौधों की बहुत छोटी वृद्धि को मापने के लिए उन्होंने क्रेस्कोग्राफ नामक उपकरण विकसित किया। उनके कार्य से पौधों की वृद्धि और उनके व्यवहार के अध्ययन को वैज्ञानिक आधार मिला।

14. सजीवों के लिए जनन का क्या महत्व है? उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर:
जनन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपनी अगली पीढ़ी उत्पन्न करते हैं। यह जीवन की निरंतरता के लिए आवश्यक है। पौधे फूल और बीज उत्पन्न करते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में ये बीज अंकुरित होकर नए पौधे बनाते हैं। इसी प्रकार जंतु भी जनन द्वारा नए जंतु उत्पन्न करते हैं। यदि जनन न हो तो एक पीढ़ी के समाप्त होने के बाद उस प्रकार के जीवों की अगली पीढ़ी नहीं बन पाएगी। इसलिए जनन सजीवों की महत्वपूर्ण विशेषता है।

15. किसी वस्तु को सजीव या निर्जीव पहचानने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

उत्तर:
किसी वस्तु की पहचान करते समय केवल उसके आकार, गति या दिखाई देने वाले परिवर्तन को नहीं देखना चाहिए। यह देखना चाहिए कि उसमें सजीवों की जीवन-प्रक्रियाएँ मौजूद हैं या नहीं। सजीवों में पोषण, वृद्धि, श्वसन, उत्सर्जन, उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया, जनन और गति जैसी विशेषताएँ पाई जाती हैं। साथ ही सजीव अंततः मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए किसी वस्तु को सजीव या निर्जीव बताने के लिए उसके अनेक जीवन-लक्षणों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण दीर्घ प्रश्न

  1. सजीवों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
  2. बीज के अंकुरण के लिए आवश्यक परिस्थितियों को प्रयोग द्वारा समझाइए।
  3. पौधे के जीवन-चक्र का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।
  4. मच्छर के जीवन-चक्र का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  5. मेंढक के जीवन-चक्र को समझाइए।
  6. मच्छर और मेंढक के जीवन-चक्र में समानताएँ और अंतर लिखिए।
  7. पौधों और जंतुओं के जीवन-चक्र की तुलना कीजिए।
  8. केवल गति के आधार पर किसी वस्तु को सजीव क्यों नहीं कहा जा सकता?
  9. मृत जीव और निर्जीव वस्तु में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  10. जगदीश चंद्र बोस का पौधों के अध्ययन में क्या योगदान था?

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