Class 12 राजनीति विज्ञान Chapter 6 : अंतर्राष्ट्रीय संगठन |International organizations
अंतर्राष्ट्रीय संगठन: संयुक्त राष्ट्र संघ और समकालीन विश्व
अंतर्राष्ट्रीय संगठन युद्ध और शांति के मामलों में देशों की सहायता करने और बेहतर जीवन स्थितियाँ बनाने के लिए अनिवार्य हैं। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव डेग हैमरसोल्ड ने कहा था, “संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन मानवता को स्वर्ग पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि उसे नरक से बचाने के लिए हुआ है”। यह संगठन उस ‘चौपाल’ की तरह है जहाँ दुनिया के देश हथियार लड़ाने के बजाय जुबान लड़ाकर विवादों का समाधान खोजते हैं।
1. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की आवश्यकता क्यों?
कुछ वैश्विक समस्याएँ इतनी चुनौतीपूर्ण होती हैं कि उनसे कोई भी देश अकेले नहीं निपट सकता।
• वैश्विक सहयोग – बीमारियाँ (जैसे महामारी) और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ (विश्वव्यापी तापवृद्धि) जैसी समस्याओं के समाधान के लिए सभी देशों का साथ आना जरूरी है।
• शांति और सुरक्षा – ये संगठन देशों के बीच मनमुटाव को युद्ध में बदलने से रोकते हैं और बातचीत का मंच प्रदान करते हैं।
• नियमों का पालन – ये संगठन सदस्य देशों के लिए नियमों और नौकरशाही की एक रूपरेखा देते हैं ताकि सभी को लाभ का न्यायोचित बराबर मिल सके।
2. संयुक्त राष्ट्र संघ का विकास और संरचना
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद विवादों को सुलझाने के लिए ‘लीग ऑफ नेशन्स’ बना था, लेकिन यह दूसरे विश्वयुद्ध को रोकने में विफल रहा। इसके उत्तराधिकारी के रूप में 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) की स्थापना हुई।
प्रमुख अंग और संरचना
• आम सभा (General Assembly) – इसमें सभी 193 सदस्य देशों को एक समान वोट का अधिकार प्राप्त है।
• सुरक्षा परिषद (Security Council) – इसमें 5 स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन) हैं, जिन्हें ‘वीटो’ (निषेधाधिकार) की शक्ति प्राप्त है। इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं।
• महासचिव – यह UN का सबसे प्रमुख सार्वजनिक चेहरा होता है। वर्तमान महासचिव एंतोनियो गुटेरेस (पुर्तगाल) हैं।
• सचिवालय और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय – सचिवालय प्रशासनिक कार्यों के लिए है और न्यायालय (मुख्यालय: हेग) विवादों के कानूनी समाधान के लिए है।
3. शीतयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र में सुधार
1991 में सोवियत संघ के बिखराव के बाद विश्व की वास्तविकताएँ बदल गई हैं। अब अमेरिका एकमात्र महाशक्ति है और चीन व भारत जैसी आर्थिक शक्तियाँ उभर रही हैं। इस संदर्भ में दो तरह के सुधारों की मांग उठ रही है—
1. बनावट और प्रक्रिया में सुधार – मुख्य रूप से सुरक्षा परिषद का विस्तार ताकि इसमें एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका का बेहतर प्रतिनिधित्व हो।
2. न्यायाधिकार की समीक्षा – यह तय करना कि संगठन केवल शांति-सुरक्षा तक सीमित रहे या मानवीय विकास (स्वास्थ्य, शिक्षा, मानवाधिकार) पर अधिक ध्यान दे।
4. सुरक्षा परिषद की सदस्यता और भारत
भारत की दावेदारी के आधार-
• भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है।
• UN के शांति बहाली अभियानों (Peacekeeping) में भारत की भूमिका हमेशा ठोस रही है।
• भारत की तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति और UN बजट में उसका नियमित योगदान। हालांकि, कुछ देश भारत के परमाणु हथियारों और पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर विरोध भी करते हैं।
5. एक-ध्रुवीय विश्व में UN की भूमिका
अमेरिका की आर्थिक और सैन्य शक्ति के कारण उसे नियंत्रित करना कठिन है। UN का मुख्यालय भी अमेरिकी भूमि पर है और इसके बजट में अमेरिका का सर्वाधिक (22%) योगदान है। इसके बावजूद, संयुक्त राष्ट्र वह मंच है जहाँ अमेरिका की नीतियों की आलोचना हो सकती है और शेष विश्व के साथ संवाद के जरिए बीच का रास्ता निकाला जा सकता है।
6. अन्य महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ
• IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) – वैश्विक वित्त-व्यवस्था की देखरेख और तकनीकी सहायता।
• विश्व बैंक (World Bank) – विकासशील देशों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए ऋण देना।
• WTO (विश्व व्यापार संगठन) – वैश्विक व्यापार के नियमों को तय करना।
• IAEA (अंतर्राष्ट्रीय आणविक ऊर्जा एजेंसी) – परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना।
• मानवाधिकार संगठन – एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठन दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करते हैं।
निष्कर्ष – संयुक्त राष्ट्र संघ में कुछ कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन इसके बिना दुनिया और अधिक बदहाल होगी। भविष्य की बढ़ती ‘पारस्परिक निर्भरता’ को देखते हुए इस संगठन का महत्व निरंतर बढ़ता रहेगा
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