Class 12 राजनीति विज्ञान Chapter 4 : सत्ता के वैकल्पिक केंद्र | Alternative centers of power

Class 12 राजनीति विज्ञान Chapter 4 : सत्ता के वैकल्पिक केंद्र | Alternative centers of power

सत्ता के वैकल्पिक केंद्र – विश्व राजनीति में नए शक्ति समीकरण

1990 के दशक की शुरुआत में सोवियत संघ के पतन और दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था के टूटने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के कुछ नए केंद्र अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दे सकते हैं। ये वैकल्पिक केंद्र न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हैं, बल्कि अपने क्षेत्रों में शांति और सहयोग बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

1. यूरोपीय संघ (European Union): एक विशाल शक्ति का उदय

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के देशों ने अपनी बर्बादी से उबरने के लिए आपसी सहयोग का रास्ता चुना।

• गठन की प्रक्रिया – अमेरिका ने ‘मार्शल योजना’ के तहत यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन में मदद की। इसके बाद 1948 में ‘यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन’ और 1949 में ‘यूरोपीय परिषद’ बनी। अंततः 1992 में ‘मास्ट्रिच संधि’ के माध्यम से यूरोपीय संघ की स्थापना हुई।

• विशेषताएँ – इसका अपना झंडा, गान, स्थापना दिवस और मुद्रा (यूरो) है। यूरोपीय संघ अब एक आर्थिक संगठन से बढ़कर एक राजनीतिक इकाई की तरह काम करने लगा है।

• शक्ति का प्रभाव – 2016 में यह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकल घरेलू उत्पाद 17,000 अरब डॉलर से अधिक था। इसके पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना और परमाणु हथियार (फ्रांस के पास) हैं।

2. आसियान (ASEAN) – दक्षिण-पूर्व एशियाई सहयोग

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ‘आसियान’ का गठन किया।

• स्थापना – 1967 में बैंकॉक घोषणा पर हस्ताक्षर करके इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड ने इसकी नींव रखी। अब इसमें 10 सदस्य देश शामिल हैं।

• आसियान शैली (ASEAN Way) – यह संगठन अनौपचारिक, टकराव-रहित और सहयोगात्मक कामकाज के लिए प्रसिद्ध है।

• तीन स्तंभ – 2003 में आसियान ने सुरक्षा, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों के रूप में तीन स्तंभों की स्थापना की।

• भारत और आसियान – भारत ने 1991 से ‘लुक ईस्ट’ और 2014 से ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के जरिए इन देशों से संबंध मजबूत किए हैं।

3. चीनी अर्थव्यवस्था का उत्थान

1949 की क्रांति के बाद चीन ने सोवियत मॉडल अपनाया था, लेकिन बाद में उसने अपनी नीतियों में बड़े बदलाव किए।

• आर्थिक सुधार – 1972 में अमेरिका से संबंध सुधारकर चीन ने अपना एकांतवास खत्म किया। 1978 में डेंग श्याओपेंग ने ‘ओपन डोर’ (मुक्त द्वार) की नीति अपनाई।

• चरणबद्ध विकास – चीन ने ‘शॉक थेरेपी’ के बजाय धीरे-धीरे सुधार किए, 1982 में खेती का निजीकरण और 1998 में उद्योगों का निजीकरण किया गया।

• भविष्य – अनुमान है कि 2040 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में अमेरिका को पीछे छोड़ सकता है।

4. भारत और चीन के संबंध

ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध रहे हैं, लेकिन आधुनिक काल में उतार-चढ़ाव आए हैं।

• विवाद – 1950 में तिब्बत पर कब्जे और सीमा विवाद के कारण 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ, जिससे संबंधों को गहरा धक्का लगा।

• सुधार के प्रयास – 1988 में राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद संबंधों में सुधार आया। अब दोनों देश आर्थिक सहयोग और व्यापार (2017 में 84 अरब डॉलर) पर ध्यान दे रहे हैं।

5. जापान और दक्षिण कोरिया तकनीकी महाशक्तियाँ

• जापान – प्राकृतिक संसाधनों की कमी के बावजूद जापान अपनी उच्च प्रौद्योगिकी (सोनी, टोयोटा आदि) के दम पर 2017 में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना। यह संयुक्त राष्ट्र के बजट में दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता (10%) है।

• दक्षिण कोरिया – 1960 से 1980 के बीच इसके तीव्र विकास को ‘हन नदी पर चमत्कार’ कहा जाता है। सैमसंग और हुंडई जैसे इसके ब्रांड पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।

निष्कर्ष – यूरोपीय संघ, आसियान, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे केंद्र यह दर्शाते हैं कि विश्व राजनीति अब केवल एक शक्ति के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, बल्कि यह बहु-ध्रुवीय दिशा में बढ़ रही है जहाँ सहयोग और आर्थिक शक्ति की प्रधानता है।


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