Class 12 राजनीति विज्ञान Chapter 1 : शीतयुद्ध का दौर | Cold War era
1. शीतयुद्ध की शुरुआत
दूसरे विश्वयुद्ध (1939-1945) की समाप्ति के साथ ही शीतयुद्ध का आरम्भ हुआ। जब अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, तो जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद वैश्विक राजनीति के मंच पर दो महाशक्तियां—संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ—उभरीं। इनके पास इतनी क्षमता थी कि वे विश्व की किसी भी घटना को प्रभावित कर सकें। इन दोनों शक्तियों के बीच की प्रतिद्वंद्विता और तनाव की श्रृंखला को ही ‘शीतयुद्ध’ कहा गया।
2. क्यूबा मिसाइल संकट (1962)
यह शीतयुद्ध का चरम बिंदु था। अप्रैल 1961 में सोवियत नेताओं को डर था कि अमेरिका क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो का तख्तापलट कर देगा। क्यूबा का झुकाव सोवियत संघ की ओर था। 1962 में सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं, जिससे अमेरिका पहली बार नजदीकी हमले की सीमा में आ गया। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी परमाणु युद्ध नहीं चाहते थे, लेकिन वे मिसाइलें हटवाने पर अड़े थे। अंततः सोवियत जहाजों ने वापसी का रुख किया और दुनिया ने चैन की सांस ली।
3. ‘अपरोध’ (Deterrence) का तर्क
शीतयुद्ध कभी भी वास्तविक युद्ध या रक्त रंजित संघर्ष में क्यों नहीं बदला? इसका उत्तर ‘अपरोध’ के तर्क में छिपा है। जब दोनों पक्षों के पास परमाणु हथियार हों और वे एक-दूसरे को असहनीय क्षति पहुँचाने में सक्षम हों, तो कोई भी युद्ध का जोखिम नहीं उठाना चाहता। परमाणु युद्ध की स्थिति में विजेता कौन है, यह तय करना भी असंभव हो जाता, क्योंकि दोनों पक्ष पूरी तरह बर्बाद हो जाते। इसी कारण प्रतिद्वंद्विता के बावजूद युद्ध ‘ठंडा’ ही रहा।
4. दो-ध्रुवीय विश्व का उदय
दोनों महाशक्तियों ने विश्व के विभिन्न हिस्सों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की, जिससे दुनिया दो गुटों में बंट गई—
• पश्चिमी गठबंधन – इसका नेतृत्व अमेरिका ने किया। यह उदारवादी लोकतंत्र और पूँजीवाद का समर्थक था। अप्रैल 1949 में नाटो (NATO) की स्थापना हुई, जिसमें 12 देश शामिल थे।
• पूर्वी गठबंधन – इसका नेतृत्व सोवियत संघ ने किया। यह समाजवाद और साम्यवाद के लिए प्रतिबद्ध था। 1955 में वारसा संधि का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य यूरोप में नाटो का मुकाबला करना था।
छोटे देश महाशक्तियों के लिए क्यों जरूरी थे?
1. संसाधन – तेल और खनिजों की प्राप्ति के लिए।
2. भू-क्षेत्र – ताकि वहाँ से हथियार और सेना संचालित की जा सके।
3. सैनिक ठिकाने – एक-दूसरे की जासूसी करने के लिए।
4. आर्थिक मदद – छोटे देश सैन्य खर्च वहन करने में सहायक थे।
5. शीतयुद्ध के दायरे और हथियार नियंत्रण
शीतयुद्ध के दौरान कई क्षेत्रों में संकट आए और युद्ध हुए (जैसे कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान), लेकिन ये परमाणु युद्ध में नहीं बदले। कोरियाई युद्ध (1950-53) में जवाहरलाल नेहरू ने मध्यस्थता की। महाशक्तियों ने बाद में महसूस किया कि हथियारों की होड़ को नियंत्रित करना जरूरी है। इसके लिए कई संधियां की गईं—
• सीमित परमाणु परीक्षण संधि (LTBT)
• परमाणु अप्रसार संधि (NPT)
• सामरिक अस्त्र परिसीमन वार्ता (SALT I और II)
• START संधियाँ
6. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)
शीतयुद्ध की गुटबाजी ने एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों के सामने अपनी आजादी खोने का खतरा पैदा कर दिया था। ऐसे में गुटनिरपेक्षता ने एक तीसरा विकल्प दिया। इसकी नींव नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया) और नासिर (मिस्र) ने रखी। 1961 में बेलग्रेड में इसका पहला सम्मेलन हुआ। इसका अर्थ ‘तटस्थता’ या ‘पृथकतावाद’ नहीं था, बल्कि महाशक्तियों के गुटों में शामिल न होकर अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय और स्वतंत्र भूमिका निभाना था।
7. नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO)
गुटनिरपेक्ष देशों के लिए आर्थिक विकास सबसे बड़ी चुनौती थी। इसी समझ से 1972 में NIEO की धारणा आई, जिसे UNCTAD की रिपोर्ट ‘Towards a New Trade Policy for Development’ में प्रस्तुत किया गया। इसके मुख्य उद्देश्य थे—
• अल्प विकसित देशों का अपने संसाधनों पर नियंत्रण।
• पश्चिमी बाजारों तक पहुँच और तकनीक की लागत कम करना।
• अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में उनकी भूमिका बढ़ाना।
8. भारत और शीतयुद्ध
भारत की भूमिका दोहरी थी – उसने स्वयं को गुटों से अलग रखा और अन्य देशों को भी इसके लिए प्रेरित किया।
• हितसाधन – गुटनिरपेक्षता के कारण भारत ऐसे अंतरराष्ट्रीय फैसले ले पाया जो उसके अपने हित में थे। वह एक महाशक्ति द्वारा अनदेखी किए जाने पर दूसरी महाशक्ति के करीब जा सकता था।
• आलोचना – आलोचकों ने इसे ‘सिद्धांतविहीन’ कहा। 1971 में भारत द्वारा सोवियत संघ के साथ की गई मित्रता की संधि को कुछ विशेषज्ञों ने गुटनिरपेक्षता का उल्लंघन माना, जबकि भारत का तर्क था कि बांग्लादेश संकट के समय उसे सैन्य और कूटनीतिक मदद की जरूरत थी। अंततः शीतयुद्ध के बाद भी गुटनिरपेक्षता के विचार प्रासंगिक हैं क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक बनाने के संकल्प पर टिका है।
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