भारत विरासतों को सहेजती एक विरासत है | India Heritage

भारत-विरासत

क्या कभी आपने सोचा है कि एक लंदन का व्यक्ति या पेरिस में बैठा व्यक्ति जब भारत की परिकल्पना अपने मन में करता होगा तो उसके दिमाग में सबसे पहले भारत के आखिर क्या दृश्य बनते होंगे?

जी बिल्कुल सही समझ रहें हैं आप जैसे जब हम भारत में बैठकर पेरिस की कल्पना करने पर एफिल टावर और लंदन की परिकल्पना करने पर बकिंघम पैलेस और टावर ब्रिज अपनी कल्पनाओं के केनवास पर उकेरते हैं ठीक वैसे ही विदेश में बैठे लोगों की कल्पना में भी भारत की तस्वीर में ताजमहल,लाल किला, कुतुब मीनार और इंडिया गेट का उकर आना लाज़मी है।

ये सभी ऐतिहासिक इमारतें भारत की वो विरासतें हैं जिनके होने से भारत की मुकम्मल तस्वीर दुनिया के पटल पर सुनहरे ढंग से उकर कर सामने आती है।

मगर क्या हम ये जानतें हैं कि इन इमारतों को किसने, क्यों,कब और कैसे बनाया या बनवाया आखिर इन इमारतों में ऐसी क्या खूबी है कि भारत की भूमि पर स्थापित लाखों इमारतों में ये कुछ चुनिंदा इमारतें ही आकर्षण का केंद्र बनी?

आपके ऐसे ही सवालों के जवाब आज हम इस लेख के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे:-

ताजमहल

ताजमहल भारत के एक राज्य उत्तर प्रदेश के शहर आगरा में यमुना नदी के दक्षिण तट पर स्थित सफ़ेद संगमरमर से बना एक मकबरा है। इसे 1632 में मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी पसंदीदा पत्नी मुमताज महल के निधन के पश्चात मकबरे के तौर पर बनवाना शुरू किया था।
मकबरा 17-हेक्टेयर यानि लगभग (42 एकड़) जमीन पर बने परिसर का केंद्रबिंदु है, जिसमें एक मस्जिद और एक गेस्ट हाउस शामिल है,इसे तीन तरफ से एक अनियंत्रित दीवार से घिरे औपचारिक उद्यान में स्थापित किया गया है।
मकबरे का निर्माण अनिवार्य रूप से (1643) में पूरा किया गया था लेकिन परियोजना के अन्य चरणों में काम करीब 10 वर्षों तक जारी रहा। माना जाता है कि ताजमहल कॉम्प्लेक्स की निर्माण परियोजना में उस्ताद अहमद लाहौरी जो की मुख्य वास्तुकार थे के नेतृत्व में लगभग 20,000 कारीगरों को रोजगार दिया गया था,ताजमहल की ऊंचाई अनुमानत: 562 फ़ीट है।

ताजमहल की जमीन पर राजपुताना राज्य के अंतर्गत जयपुर के महाराजा जयसिंह का आलीशान महल हुआ करता था। शाहजहाँ ने इस जमीन के बदले जयपुर के महाराजा जयसिंह को आगरा शहर के बीच एक बड़ा महल दिया था। ताजमहल को बनाने के लिए लगभग तीन एकड़ के क्षेत्र को खोद कर उसमें कूडा़ कर्कट भर कर उसे नदी की सतह से पचास मीटर ऊँचा बनाना पड़ा था , जिससे कि इमारत को सीलन आदि से बचाया जा सके। मकबरे के क्षेत्र के अंदर, पचास कुँए खोद कर फिर उन्हें कंकड़-पत्थरों से भर मजबूत नींव भरी गई थी तत्पश्चात ईंटों से, मकबरे का ढाँचा बनाया गया था। यह ढाँचा इतना बडा़ था, कि अभियाँत्रिकों के अनुमान से उसे हटाने में ही सालों लग जाते। इसका समाधान यह हुआ, कि शाहजाहाँ के आदेशानुसार स्थानीय किसानों को खुली छूट दी गई कि एक दिन में कोई भी चाहे जितनी ईंटें उठा सकता है इस सूचना के मिलते ही वह ढाँचा रात भर में ही साफ हो गया। सारी निर्माण सामग्री एवं संगमर्मर को नियत स्थान पर पहुँचाने हेतु, एक पंद्रह किलोमीटर लम्बा मिट्टी का ढाल बनाया गया। बीस से तीस बैलों को खास निर्मित गाडि़यों में जोतकर शिलाखण्डों को यहाँ लाया गया था। एक विस्तृत पैड़ एवं बल्ली से बनी, चरखी चलाने की प्रणाली बनाई गई, जिससे कि खण्डों को इच्छित स्थानों पर पहुँचाया गया। नदी से पानी लाने हेतु (रहट) प्रणाली का प्रयोग किया गया था। उससे पानी ऊपर बने बडे़ टैंकों में भरा जाता था, जहाँ से यह नालियों (पाइपों) की मदद से तमाम जरूरतों के स्थानों पर पहुँचाया जाता था।

आधारशिला एवं मकबरे को निर्मित होने में बारह साल लगे। शेष इमारतों एवं भागों को अगले दस वर्षों में पूर्ण किया गया। इनमें पहले मीनारें, फिर मस्जिद,एवं अंत में मुख्य द्वार बने। क्योंकि यह समूह, कई अवस्थाओं में बना, इसलिए इसकी निर्माण-समाप्ति तिथि में कई भिन्नताएं हैं। यह इसलिए भी है, क्योंकि पूर्णता के कई पृथक मत हैं। उदाहरणतः मुख्य मकबरा 1643 में पूर्ण हुआ था, किंतु शेष समूह इमारतें बनती रहीं। इसी प्रकार इसकी निर्माण कीमत में भी भिन्नताएं हैं, क्योंकि इसकी कीमत तय करने में समय के अंतराल से काफी अंतर आ गया है। फिर भी कुल मूल्य लगभग 3 अरब 20 करोड़ रुपए, उस समयानुसार आंका गया है; जो कि वर्तमान में खरबों डॉलर से भी अधिक हो सकता है, इसे यदि वर्तमान मुद्रा में बदला जाए तो,ताजमहल को सम्पूर्ण भारत एवं एशिया से लाई गई सामग्री से बनाया गया था। 1,000 से अधिक हाथी इसके निर्माण के दौरान यातायात हेतु प्रयोग में लाए गए थे। सफेद संगमरमर पत्थर को राजस्थान के मकराना से लाया गया था, जैस्पर को पंजाब से, हरिताश्म या जेड एवं स्फटिक या क्रिस्टल को चीन से फिरोजा को तिब्बत से, अफगानिस्तान से लैपिज़ लजू़ली, श्रीलंका से नीलम एवं अरबिया से इंद्रगोप लाए गए थे। कुल मिला कर अठ्ठाइस प्रकार के बहुमूल्य पत्थर एवं रत्न श्वेत संगमर्मर इसमें जडे. गए थे।

उत्तरी भारत से लगभग बीस हजा़र मज़दूरों की एक विशाल टोली लगातार कार्य कर रही थी। बुखारा से शिल्पकार, सीरिया एवं ईरान से सुलेखन कर्ता, दक्षिण भारत से पच्चीकारी के कारीगर, बलूचिस्तान से पत्थर तराशने एवं काटने वाले कारीगर इनमें शामिल थे। कंगूरे, बुर्जी एवं कलश आदि बनाने वाले, दूसरे जो केवल संगमर्मर पर पुष्प तराशता थे, आदि सत्ताईस कारीगरों में से कुछ एक थे, जिन्होंने सृजन इकाई गठित की थी। कुछ खास कारीगर, जो ताजमहल के निर्माण में अपना स्थान रखते हैं, उनके नाम निम्नलिखित हैं

मुख्य गुम्बद का अभिकल्पक इस्माइल खाँ ने किया ,जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य का प्रमुख गोलार्ध एवं गुम्बद अभिकल्पककर्ता था।
फारस के उस्ताद ईसा एवं ईसा मुहम्मद एफेंदी (दोनों ईरान से), जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य के कोचा मिमार सिनान आगा द्वारा प्रशिक्षित किए गए थे, इनका बार-बार यहाँ की मूर अभिकल्पना में उल्लेख आता है। परंतु इस दावे के पीछे बहुत कम साक्ष्य हैं।
बेनारुस, फारस (ईरान) से ‘पुरु’ को पर्यवेक्षण वास्तुकार नियुक्त किया गया था, का़जि़म खान, लाहौर का निवासी था, जिसने ठोस सुवर्ण कलश निर्मित किया।

चिरंजी लाल, दिल्ली का एक लैपिडरी, को प्रधान शिलपी, एवं पच्चीकारक घोषित किया गया था।अमानत खाँ, जो कि शिराज़, ईरान से था, मुख्य सुलेखन कर्त्ता था। उसका नाम मुख्य द्वार के सुलेखन के अंत में खुदा
मुहम्मद हनीफ, राज मिस्त्रियों का पर्यवेक्षक था, साथ ही मीर अब्दुल करीम एवं मुकर्‍इमत खां, शिराज़, ईरान से; इनके हाथिओं में प्रतिदिन का वित्त एवं प्रबंधन था।

ताज महल का केन्द्र बिंदु एक वर्गाकार नींव आधार पर बना श्वेत संगमर्मर का मक़बरा है। यह एक सममितीय इमारत है, जिसमें एक ईवान यानि अतीव विशाल वक्राकार (मेहराब रूपी) द्वार है। इस इमारत के ऊपर एक वृहत गुम्बद सुशोभित है। अधिकतर मुग़ल मक़बरों के जैसे, इसके मूल अवयव फ़ारसी उद्गम से हैं।

इसका मूल-आधार एक विशाल बहु-कक्षीय संरचना है। इसका प्रधान कक्ष घनाकार है, जिसका प्रत्येक किनारा 55 मीटर है किनारों पर एक भारी-भरकम पिश्ताक, या मेहराबाकार छत वाले कक्ष द्वार हैं। यह ऊपर बने मेहराब वाले छज्जे से मिले हुए है।
मुख्य मेहराब के दोनों ओर,एक के ऊपर दूसरा, शैली में, दोनों ओर दो-दो अतिरिक्त पिश्ताक़ बने हैं। इसी शैली में, कक्ष के चारों किनारों पर दो-दो पिश्ताक (एक के ऊपर दूसरा) बने हैं। यह रचना इमारत के प्रत्येक ओर पूर्णतया सममितीय है, जो कि इस इमारत को वर्ग के बजाय अष्टकोण बनाती है, परंतु कोने के चारों भुजाएं बाकी चार किनारों से काफी छोटी होने के कारण, इसे वर्गाकार कहना ही उचित होगा। मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दृश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं। मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं। ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है।

1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, ताजमहल को ब्रिटिश सैनिकों एवं सरकारी अधिकारियों द्वारा काफी विरुपण सहना पडा़ था। इन्होंने बहुमूल्य पत्थर एवं रत्न, तथा लैपिज़ लजू़ली को खोद कर दीवारों से निकाल लिया था। 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश वाइसरॉय जॉर्ज नैथैनियल कर्ज़न ने एक वृहत प्रत्यावर्तन परियोजना आरंभ की। यह 1908 में पूर्ण हुई। उसने आंतरिक कक्ष में एक बडा़ दीपक या चिराग स्थापित किया, जो काहिरा में स्थित एक मस्जिद जैसा ही है। इसी समय यहाँ के बागों को ब्रिटिश शैली में बदला गया था। वही आज दर्शित हैं। सन् 1942 में, सरकार ने मकबरे के इर्द्-गिर्द, एक मचान सहित पैड़ बल्ली का सुरक्षा कवच तैयार कराया था। यह जर्मन एवं बाद में जापानी हवाई हमले से सुरक्षा प्रदान कर पाए। 1965 एवं 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय भी यही किया गया था, जिससे कि वायु बमवर्षकों को भ्रमित किया जा सके। इसके वर्तमान खतरे वातावरण के प्रदूषण से हैं, जो कि यमुना नदी के तट पर है, एवं अम्ल-वर्षा से, जो कि मथुरा तेल शोधक कारखाने से निकले धुंए के कारण है। इसका सर्वोच्च न्यायालय के निदेशानुसार भी कडा़ विरोध हुआ था। 1983 में ताजमहल को युनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

क़ुतुब मीनार

क़ुतुब मीनार भारत की राजधानी दिल्ली के महरौली में स्थित, ईंट से बनी विश्व की सबसे ऊँची मीनार है। इसे दिल्ली के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में से एक माना जाता है। इसकी ऊँचाई 73 मीटर (239.5 फीट) और व्यास 24.6 मीटर है, जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) हो जाता है। इसमें 379 सीढियाँ हैं। मीनार के चारों ओर बने अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनमें से अनेक इसके निर्माण काल सन 1192 के हैं। यह परिसर युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में स्वीकृत किया गया है। कुतुब मीनार परिसर में एक कुतुब स्तंभ भी है जिसपर जंग नही लगती है।

क़ुतुब मीनार अफ़गानिस्तान में स्थित,जाम की मीनार से प्रेरित लगती है उस मीनार से अच्छी मीनार बनाने की इच्छा रखते हुए दिल्ली के प्रथम मुस्लिम शासक क़ुतुबुद्दीन ऐबक,ने इस मीनार का निर्माण शुरू करवाया था ,परंतु वह इस मीनार का केवल आधार ही बनवा पाया था। उसके बाद उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इसमें तीन मंजिलों को और बनवाया इसके बाद सन 1368 में फीरोजशाह तुगलक ने पाँचवीं या कहें अंतिम मंजिल बनवाई। मीनार को लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया है, क़ुतुब मीनार लाल और बफ सेंड स्टोन से बनी भारत की सबसे ऊंची मीनार है।

13वीं शताब्‍दी में निर्मित यह भव्‍य मीनार राजधानी, दिल्‍ली में खड़ी है। इस परिसर में अन्‍य महत्‍वपूर्ण स्‍मारक भी हैं जैसे कि 1310 में निर्मित एक द्वार, अलाइ दरवाजा, कुवत उल इस्‍लाम मस्जिद; इल्लतुतमिश, अलाउद्दीन खिलजी तथा इमाम जामिन के मकबरे; अलाइ मीनार, सात मीटर ऊंचा लोहे का स्‍तंभ आदि।

गुलाम राजवंश के क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने मीनार की नींव रखी थी और यह नमाज़ अदा करने की पुकार लगाने के लिए बनाई गई थी तथा इसकी पहली मंजिल बनाई गई थी, इसकी सभी मंजिलों के चारों ओर आगे बढ़े हुए छज्‍जे हैं जो मीनार को घेरते हैं तथा इन्‍हें पत्‍थर के ब्रेकेट से सहारा दिया गया है, जिन पर मधुमक्‍खी के छत्ते के समान सजावट है और यह सजावट पहली मंजिल पर अधिक स्‍पष्‍ट है।

लाल किला

लाल किला देश की राजधानी दिल्ली में स्थित है जो भारतीय और मुगल वास्तुशैली से प्रेरित है इस भव्य ऐतिहासिक कलाकृति का निर्माण पांचवे मुगल शासक शाहजहां ने करवाया था। लाल किला जो कि तीनों तरफ से यमुना नदीं से घिरा हुआ है, जिसके अद्भुत सौंदर्य और आर्कषण को देख मन मंत्र मुग्ध हो जाता है. विश्व धरोहर की लिस्ट में शुमार दुनिया के इस सर्वश्रेष्ठ किले के निर्माण कार्य की शुरुआत मुगल सम्राट शाहजहां द्धारा 1638 ईसवी में करवाई गई थी। भारत के इस भव्य लाल किले का निर्माण काम लगभग 1648 ईसवी तक करीब दस सालों तक चला था। मुगल बादशाह शाहजहां के द्धारा बनवाई गई सभी इमारतों का अपना-अपना अलग-अलग ऐतिहासिक महत्व है। जबकि उनके द्वारा बनवाया गये ताजमहल को उसके सौंदर्य और आर्कषण की वजह से जिस तरह दुनिया के सात अजूबों में शुमार किया गया है, उसी तरह दिल्ली के लाल किला को विश्व भर में शोहरत मिली है। इस भव्य ऐतिहासिक किले के प्रति लोगों की सच्ची श्रद्धा और सम्मान है।

आपको बता दें कि शाहजहां, इस किले को उनके द्वारा बनवाए गए सभी किलों में बेहद आर्कषक और सुंदर बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 1638 ईसवी में ही अपनी राजधानी आगरा को दिल्ली शिफ्ट कर लिया था, और फिर तल्लीनता से इस किले के निर्माण में ध्यान देकर इसे भव्य और आर्कषक रुप दिया था

मुगल सम्राट शाहजहां ने आगरा में स्थित ताजमहल को भव्य रुप देने वाले डिजाइनर और मुगल काल के प्रसिद्ध वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को इस किले की शाही डिजाइन बनाने के लिए चुना था।वहीं उस्ताद अहमद अपने नाम की तरह ही अपनी कल्पना शक्ति से शानदार इमारत बनाने में उस्ताद थे, उन्होंने लाल किले को बनवाने में भी अपनी पूरी विवेकशीलता और कल्पनाशीलता का इस्तेमाल कर इसे अति सुंदर और भव्य रुप दिया था। यही वजह है कि लाल किले के निर्माण के इतने सालों के बाद आज भी इस किले की विशालता और खूबसूरती के लिए इसे विश्व भऱ में जाना जाता है। इस भव्य किले की बनने की वजह से भारत की राजधानी दिल्ली को शाहजहांनाबाद कहा जाता था, साथ ही यह शाहजहां के शासनकाल की रचनात्मकता की मिसाल माना जाता है। मुगल सम्राट शाहजहां के बाद उसके बेटे औरंगजेब ने इस किले में मोती-मस्जिद (Moti Masjid) का भी निर्माण करवाया था।
वहीं 17वीं शताब्दी में जब लाल किले पर मुगल बादशाह जहंदर शाह का कब्जा हो गया था, तब करीब 30 साल तक लाल किले को बिना शासक के रहना पड़ा था। इसके बाद नादिर शाह ने लाल किले पर अपना शासन चलाया I इसके बाद 18वीं सदी में अंग्रेजों ने लाल किले पर अपना कब्जा जमा लिया और इस किले में जमकर लूट-पाट की। भारत की आजादी के बाद सबसे पहले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस पर तिरंगा फहराकर देश के नाम संदेश दिया था।

वहीं आजादी के बाद लाल किले का इस्तेमाल सैनिक प्रशिक्षण के लिए किया जाने लगा और फिर यह एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रुप में मशहूर हुआ, वहीं इसके आर्कषण और भव्यता की वजह से इसे 2007 में विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया था
लाल किले को अपना नाम लाल बलुआ पत्थर की प्राचीर एवं दीवार के कारण मिला है। यही इसकी चार दीवारी बनाती है। यह दीवार 1.5 मील (2.5 किमी) लम्बी है और नदी के किनारे से इसकी ऊँचाई 60 फीट (16मी), तथा 110 फीट (35 मी) ऊँची शहर की ओर से है। इसके नाप जोख करने पर ज्ञात हुआ है, कि इसकी योजना एक 82 मी की वर्गाकार ग्रिड (चौखाने) का प्रयोग कर बनाई गई है।

लाल किले की योजना पूर्ण रूप से की गई थी और इसके बाद के बदलावों ने भी इसकी योजना के मूलरूप में कोई बदलाव नहीं होने दिया है। 18वीं सदी में कुछ लुटेरों एवं आक्रमणकारियों द्वारा इसके कई भागों को क्षति पहुँचाई गई थी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद, किले को ब्रिटिश सेना के मुख्यालय के रूप में प्रयोग किया जाने लगा था। इस सेना ने इसके करीब अस्सी प्रतिशत मण्डपों तथा उद्यानों को नष्ट कर दिया। इन नष्ट हुए बागों एवं बचे भागों को पुनर्स्थापित करने की योजना सन 1903 में उमैद दानिश द्वारा चलाई गई।

इसकी दीवारें, काफी सुचिक्कनता से तराशी गईं हैं। ये दीवारें दो मुख्य द्वारों पर खुली हैं दिल्ली दरवाज़ा एवं लाहौर दरवाज़ा। लाहौर दरवाज़ा इसका मुख्य प्रवेशद्वार है। इसके अन्दर एक लम्बा बाजार है, चट्टा चौक, जिसकी दीवारें दुकानों से कतारित हैं। इसके बाद एक बडा़ खुला स्थान है, जहाँ यह लम्बी उत्तर-दक्षिण सड़क को काटती है। यही सड़क पहले किले को सैनिक एवं नागरिक महलों के भागों में बांटती थी। इस सड़क का दक्षिणी छोर दिल्ली गेट पर है।

नक्करख़ाना

लाहौरी गेट से चाँदनी चौक तक आने वाली सड़क से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक्कारखाना बना है। यह संगीतज्ञों हेतु बने महल का मुख्य द्वार है।

दीवान-ए-आम

इस गेट के पार एक और खुला मैदान है, जो कि मुलतः दीवाने-ए-आम का प्रांगण हुआ करता था। दीवान-ए-आम। यह जनसाधारण हेतु बना वृहत प्रांगण था। एक अलंकृत सिंहासन का छज्जा दीवान की पूर्वी दीवार के बीचों बीच बना था। यह सुलेमान के राज सिंहासन की नकल ही था।

दीवान-ए-ख़ास

अगला मण्डप है दीवान-ए-खास, जो राजा का मुक्तहस्त से सुसज्जित निजी सभा कक्ष था। यह सचिवीय एवं मंत्रीमण्डल तथा सभासदों से बैठकों के काम आता था इस मण्डप में पुष्पीय आकृति से मण्डित स्तंभ बने हैं। इनमें सुवर्ण पर्त भी मढी है, तथा बहुमूल्य रत्न जडे़ हैं। इसकी मूल छत को रोगन की गई काष्ठ निर्मित छत से बदल दिया गया है।

नहर-ए-बहिश्त

राजगद्दी के पीछे की ओर शाही निजी कक्ष स्थापित हैं। इस क्षेत्र में, पूर्वी छोर पर ऊँचे चबूतरों पर बने गुम्बददार इमारतों की कतारें है, जिनसे यमुना नदी का किनारा दिखाई पड़ता है। ये मण्डप एक छोटी नहर से जुडे़ हैं, जिसे नहर-ए-बहिश्त कहते हैं, जो सभी कक्षों के बीच से जाती है। किले के पूर्वोत्तर छोर पर बने शाह बुर्ज पर यमुना से पानी चढा़या जाता है, जहाँ से इस नहर की जल आपूर्ति होती है। इस किले का परिरूप कुरान में वर्णित स्वर्ग या जन्नत के अनुसार बना है। यहाँ लिखी एक आयत कहती है,

यदि पृथ्वी पर कहीं जन्नत है, तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है।

महल की योजना मूलरूप से इस्लामी है, परंतु प्रत्येक मण्डप अपने वास्तु घटकों में हिन्दू वास्तुकला को प्रकट करता है। लालकिले का प्रासाद, शाहजहानी शैली का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करता है।

खास महल

दक्षिण से तीसरा मण्डप है खास महल। इसमें शाही कक्ष बने हैं। इनमें राजसी शयन-कक्ष, प्रार्थना-कक्ष, एक बरामदा और मुसम्मन बुर्ज बने हैं। इस बुर्ज से बादशाह जनता को दर्शन देते थे।

ज़नाना

महल के दो दक्षिणवर्ती प्रासाद महिलाओं हेतु बने हैं, जिन्हें जनाना कहते हैं: मुमताज महल, जो अब संग्रहालय बना हुआ है, एवं रंग महल, जिसमें सुवर्ण मण्डित नक्काशीकृत छतें एवं संगमर्मर सरोवर बने हैं, इसमें नहर-ए-बहिश्त से जल आता है।

हमाम

अगला मण्डप है, हमाम, जो की राजसी स्नानागार था, एवं तुर्की शैली में बना है। इसमें संगमर्मर में मुगल अलंकरण एवं रंगीन पाषाण भी जडे़ हैं।

मोती मस्जिद

हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद बनी है। यह सन् 1659 में, बाद में बनाई गई थी, जो औरंगजे़ब की निजी मस्जिद थी। यह एक छोटी तीन गुम्बद वाली, तराशे हुए श्वेत संगमर्मर से निर्मित है। इसका मुख्य फलक तीन मेहराबों से युक्त है, एवं आंगन में उतरता है।जहाँ फुलो का मेला है

हयात बख़्श बाग

इसके उत्तर में एक वृहत औपचारिक उद्यान है जिसे हयात बख्श बाग कहते हैं। इसका अर्थ है जीवन दायी उद्यान। यह दो कुल्याओं द्वारा द्विभाजित है। एक मण्डप उत्तर दक्षिण कुल्या के दोनों छोरों पर स्थित हैं एवं एक तीसरा बाद में अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा 1842 में बनवाया गया था। यह दोनों कुल्याओं के मिलन स्थल के केन्द्र में बना है।

इंडिया गेट

इण्डिया गेट, (मूल रूप से अखिल भारतीय युद्ध स्मारक कहा जाता है), नई दिल्ली के कर्तव्यपथ पर स्थित 43 मीटर ऊँचा विशाल गेट है। यह स्वतन्त्र भारत का राष्ट्रीय स्मारक है, जिसे पूर्व में किंग्सवे कहा जाता था। इसका डिजाइन सर एडवर्ड लुटियन्स ने तैयार किया था। यह स्मारक पेरिस के आर्क डे ट्रॉयम्फ़ से प्रेरित है। इसे सन् 1939 में बनाया गया था। मूल रूप से अखिल भारतीय युद्ध स्मारक के रूप में जाने वाले इस स्मारक का निर्माण अंग्रेज शासकों द्वारा उन 10000 भारतीय सैनिकों की स्मृति में किया गया था जो ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर प्रथम विश्वयुद्ध और अफ़ग़ान युद्धों में शहीद हुए थे। यूनाइटेड किंगडम के कुछ सैनिकों और अधिकारियों सहित 13,300 सैनिकों के नाम, गेट पर उत्कीर्ण हैं।लाल और पीले बलुआ पत्थरों से बना हुआ यह स्मारक दर्शनीय है।
जब इण्डिया गेट बनकर तैयार हुआ था तब इसके सामने जार्ज पंचम की एक मूर्ति लगी हुई थी। जिसे बाद में ब्रिटिश राज के समय की अन्य मूर्तियों के साथ कोरोनेशन पार्क में स्थापित कर दिया गया। अब जार्ज पंचम की मूर्ति की जगह प्रतीक के रूप में केवल एक छतरी भर रह गयी है।

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् इण्डिया गेट भारतीय सेना के अज्ञात सैनिकों के मकबरे की साइट मात्र बनकर रह गया है। इसकी मेहराब के नीचे अमर जवान ज्योति स्थापित कर दी गयी है। अनाम सैनिकों की स्मृति में यहाँ एक राइफ़ल के ऊपर सैनिक की टोपी सजा दी गयी है जिसके चारो कोनों पर सदैव एक ज्योति जलती रहती है। इस अमर जवान ज्योति पर प्रति वर्ष प्रधान मन्त्री व तीनों सेनाध्यक्ष पुष्प चक्र चढ़ाकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इण्डिया गेट की दीवारों पर हजारों शहीद सैनिकों के नाम खुदे हैं और सबसे ऊपर अंग्रेजी में लिखा हैः

To the dead of the Indian armies who fell honoured in France and Flanders Mesopotamia and Persia East Africa Gallipoli and elsewhere in the near and the far-east and in sacred memory also of those whose names are recorded and who fell in India or the north-west frontier and during the Third Afgan War.

दिल्ली की कई महत्वपूर्ण सड़कें इण्डिया गेट के कोनों से निकलती हैं। रात के समय यहाँ मेले जैसा माहौल होता है।
1920 के दशक तक, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पूरे शहर का एकमात्र रेलवे स्टेशन हुआ करता था। आगरा-दिल्ली रेलवे लाइन उस समय लुटियन की दिल्ली और किंग्सवे यानी राजाओं के गुजरने का रास्ता, जिसे अब हिन्दी में राजपथ नाम दे दिया गया है, पर स्थित वर्तमान इण्डिया गेट के निर्माण-स्थल से होकर गुजरती थी। आखिरकार इस रेलवे लाइन को यमुना नदी के पास स्थानान्तरित कर दिया गया। तदुपरान्त सन् 1924 में जब यह मार्ग आरंभ हुआ तब कहीं जाकर स्मारक स्थल का निर्माण शुरू हो सका।
पहले इण्डिया गेट के आसपास होकर काफी यातायात गुजरता था। परन्तु अब इसे भारी वाहनों के लिये बन्द कर दिया गया है। शाम के समय जब स्मारक को प्रकाशित किया जाता है तब इण्डिया गेट के चारो ओर एवं राजपथ के दोनों ओर घास के मैदानों में लोगों की भारी भीड़ एकत्र हो जाती है। 625 मीटर के व्यास में स्थित इण्डिया गेट का षट्भुजीय क्षेत्र 30,6000 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में फैला है।

हर वर्ष गणतंत्र दिवस पर निकलने वाली परेड राष्ट्रपति भवन से शुरू होकर इण्डिया गेट से होते हुए लाल किले तक पहुँचती है।

देश के राष्ट्रपति इंडिया गेट पर ही इस परेड को सलामी भी देते हैं…

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